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करेंट अफेयर्स 14 सितंबर 2026: हिंदी दिवस, राजभाषाओं का संवैधानिक ढांचा और भाषाई संघवाद | अथर्व एग्जामवाइज़ करेंट न्यूज़ करेंट अफेयर्स 14 सितंबर 2026: हिंदी दिवस, राजभाषाओं का संवैधानिक ढांचा और भाषाई संघवाद | अथर्व एग्जामवाइज़ करेंट न्यूज़

14 Sep 2026 14 Sep 2026

करेंट अफेयर्स 14 सितंबर 2026: हिंदी दिवस, राजभाषाओं का संवैधानिक ढांचा और भाषाई संघवाद | अथर्व एग्जामवाइज़ करेंट न्यूज़
Indian Polity Hindi 14 Sep 2026

करेंट अफेयर्स 14 सितंबर 2026: हिंदी दिवस, राजभाषाओं का संवैधानिक ढांचा और भाषाई संघवाद | अथर्व एग्जामवाइज़ करेंट न्यूज़

हिंदी दिवस 2026 का संदर्भ और संघ का भाषाई शासन

प्रतिवर्ष 14 सितंबर को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय हिंदी दिवस 1949 के उस ऐतिहासिक मील के पत्थर को चिह्नित करता है, जब संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अपनाया था। प्रतीकात्मक स्मरणोत्सव से परे, यह तिथि प्रशासनिक अनुपालन, भाषाई संघवाद और भारत के बहुभाषी तंत्र को संचालित करने वाले संवैधानिक निर्देशों के मूल्यांकन के लिए एक वैधानिक मानदंड के रूप में कार्य करती है।

2026 के समारोह के लिए, गृह मंत्रालय के अधीन राजभाषा विभाग ने महाराष्ट्र के नवी मुंबई स्थित सिडको एग्जीबिशन सेंटर में छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया। केंद्रीय गृह मंत्री के तत्वावधान में आयोजित इस शिखर सम्मेलन में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, भाषाई शोधकर्ताओं और सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारियों को संघ के प्रशासनिक चैनलों में क्षेत्रीय भाषा के कार्यान्वयन का मूल्यांकन करने के लिए बुलाया गया। यह प्रशासनिक सम्मेलन गांधीनगर (2025) और पुणे (2024) में हुए पिछले सम्मेलनों का अनुसरण करता है, जो राजभाषा विमर्शों को गैर-हिंदी भाषाई क्षेत्रों में ले जाने और क्षेत्रीय भाषाई तालमेल को बढ़ावा देने के लिए एक विकेंद्रीकृत रणनीति को आगे बढ़ाता है। सत्र के दौरान, केंद्र सरकार ने प्रशासनिक अनुपालन और स्वदेशी मूल पुस्तक प्रकाशन को मान्यता देने के लिए प्रतिष्ठित राजभाषा कीर्ति पुरस्कार और राजभाषा गौरव पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रीय शासन की प्रवृत्तियों पर नज़र रखने वाले उम्मीदवार 'अथर्व एग्जामवाइज़ करेंट न्यूज़' पोर्टल पर निरंतर विश्लेषणात्मक अपडेट देख सकते हैं, जो सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए केंद्रित वैचारिक विश्लेषण प्रदान करता है।

ऐतिहासिक उत्पत्ति: संविधान सभा और मुंशी-अय्यंगार समझौता

1946 और 1949 के बीच, भाषा का प्रश्न संविधान सभा के समक्ष सबसे अधिक ध्रुवीकरण करने वाले विवादों में से एक के रूप में उभरा। राष्ट्रीय पहचान और भाषाई प्रतिनिधित्व के संबंध में प्रतिनिधि अलग-अलग वैचारिक गुटों में बंट गए:

हिंदी समर्थक गुट: आर. वी. धुलेकर, सेठ गोविंद दास और पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व वाले इस गुट ने तर्क दिया कि विऔपनिवेशीकरण की मांग है कि हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित किया जाए।

हिंदुस्तानी के समर्थक: काजी सैयद करीमुद्दीन सहित महात्मा गांधी के दर्शन का समर्थन करने वाले प्रतिनिधियों ने हिंदुस्तानी—हिंदी और उर्दू मुहावरों के मिश्रण वाले एक मिश्रित माध्यम—को सांप्रदायिक विभाजन को पाटने में सक्षम एक समावेशी समान आधार के रूप में समर्थन दिया।

संस्कृत के समर्थक: बंगाल के प्रतिनिधियों, जैसे पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रा, ने संस्कृत की वकालत की और इसकी ऐतिहासिक तटस्थता व विविध क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक समान मूल के रूप में इसकी स्थिति पर जोर दिया।

इन दृष्टिकोणों को प्रायद्वीपीय भारत के प्रतिनिधियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। मद्रास के टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार जैसे वक्ताओं ने तर्क दिया कि क्षेत्रीय भाषाओं में हिंदी के बराबर या उससे पुरानी साहित्यिक विरासत मौजूद है। उन्होंने आगाह किया कि हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा घोषित करने से गैर-हिंदी भाषी आबादी संस्थागत, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से नुकसान में आ जाएगी।

इस गतिरोध को दूर करने के लिए, प्रारूप समिति के सदस्य के. एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी अय्यंगार ने मुंशी-अय्यंगार फॉर्मूला के रूप में नामित एक अंतरिम परिचालन आम सहमति तैयार की, जिसे 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा औपचारिक रूप से अनुमोदित किया गया। यह तारीख व्यौहार राजेंद्र सिंह के 50वें जन्मदिन के साथ भी मेल खाती है, जो एक बुद्धिजीवी थे, जिन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, काका कालेलकर और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यिक विद्वानों के साथ मिलकर हिंदी को प्रशासनिक रूप से अपनाने के लिए व्यापक अभियान चलाया था।

मुंशी-अय्यंगार फॉर्मूला तीन मुख्य समझौतों के इर्द-गिर्द संरचित किया गया था:

देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को संघ की राजभाषा नामित किया गया, जिसमें जानबूझकर "राष्ट्रभाषा" के कानूनी रूप से लागू करने योग्य पदनाम से बचा गया।

अंग्रेजी को 15 वर्षों की अंतरिम संक्रमण अवधि के लिए एक सहयोगी राजभाषा के रूप में बनाए रखा गया था, जो 25 जनवरी 1965 को समाप्त होनी थी।

संघ के सभी आधिकारिक कार्यों के लिए भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप (1, 2, 3...) को अपनाया गया, जिसने देवनागरी अंकों के पक्ष में दिए गए तर्कों को खारिज कर दिया।

1953 में, प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 14 सितंबर को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में संस्थागत रूप दिया, जिससे राजभाषा जनादेश को लागू करने में प्रशासनिक प्रगति को मापने के लिए एक वार्षिक तंत्र स्थापित हुआ।

तुलनात्मक ढांचा: राष्ट्रीय हिंदी दिवस बनाम विश्व हिंदी दिवस

सामान्य परीक्षा त्रुटियों से बचने के लिए, प्रतियोगी परीक्षार्थियों को घरेलू प्रशासनिक जनादेशों और बाहरी सांस्कृतिक कूटनीति के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करना चाहिए:

मूल्यांकन मानदंडराष्ट्रीय हिंदी दिवसविश्व हिंदी दिवस
वार्षिक तिथि14 सितंबर10 जनवरी
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि1949 में संविधान सभा द्वारा संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी को अपनाना1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की स्मृति
औपचारिक शुरुआत1953 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अंतर्गत संस्थागत2006 में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के अंतर्गत संस्थागत
प्रशासनिक नोडल एजेंसीराजभाषा विभाग, गृह मंत्रालयविदेश मंत्रालय (MEA)
रणनीतिक फोकसअंतर-सरकारी संचार, संघीय अनुपालन, और घरेलू प्रशासनिक शासनसांस्कृतिक कूटनीति, वैश्विक भाषाई आउटरीच, और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता
संबद्ध तंत्रअखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन; राजभाषा पुरस्कारविदेशों में राजनयिक मिशन; मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय

भाग XVII (अनुच्छेद 343-351) की संवैधानिक वास्तुकला

भारत का भाषा के प्रति संवैधानिक दृष्टिकोण भाग XVII में संहिताबद्ध है, जिसे राष्ट्रीय एकरूपता और क्षेत्रीय स्वायत्तता को संतुलित करने वाले चार विशेष अध्यायों में विभाजित किया गया है:

संवैधानिक अध्यायअनुच्छेदकार्यात्मक जनादेश और न्यायशास्त्रीय दायरा
अध्याय I: संघ की भाषाअनुच्छेद 343 और 344अनुच्छेद 343(1) अंतरराष्ट्रीय अंकों के साथ देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में नामित करता है। अनुच्छेद 343(2) ने 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी को संरक्षित किया। अनुच्छेद 343(3) ने संसद को कानून के माध्यम से अनिश्चित काल तक अंग्रेजी के उपयोग को बढ़ाने का अधिकार दिया। अनुच्छेद 344, 5 और 10 साल के अंतराल पर एक राजभाषा आयोग और राजभाषा पर 30 सदस्यीय संसदीय समिति को अनिवार्य करता है।
अध्याय II: प्रादेशिक भाषाएंअनुच्छेद 345, 346 और 347अनुच्छेद 345 राज्य विधानसभाओं को प्रशासनिक कार्यों के लिए किसी भी क्षेत्रीय भाषा या हिंदी को अपनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 346 राज्यों और संघ के बीच संचार को नियंत्रित करता है। अनुच्छेद 347 राज्य की आबादी के एक बड़े हिस्से द्वारा बोली जाने वाली अल्पसंख्यक भाषाओं को राष्ट्रपति द्वारा मान्यता देने की अनुमति देता है।
अध्याय III: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषाअनुच्छेद 348 और 349अनुच्छेद 348(1) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की कार्यवाही के प्रामाणिक पाठों के साथ-साथ विधायी विधेयकों, अधिनियमों और अध्यादेशों के लिए अंग्रेजी को अनिवार्य बनाता है। अनुच्छेद 348(2) राज्यपालों को राष्ट्रपति की सहमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी या राज्य की भाषाओं को पेश करने की अनुमति देता है, जिसमें अंतिम निर्णय शामिल नहीं हैं। अनुच्छेद 349 ने प्रारंभिक 15-वर्षीय विंडो के दौरान भाषा से संबंधित विशेष विधायी प्रक्रियाओं को नियंत्रित किया।
अध्याय IV: विशेष निर्देशअनुच्छेद 350, 350A, 350B और 351अनुच्छेद 350 किसी भी भाषा में सार्वजनिक अधिकारियों को याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 350A भाषाई अल्पसंख्यक बच्चों को मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा की गारंटी देता है। अनुच्छेद 350B भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की स्थापना करता है। अनुच्छेद 351 संघ को सामासिक राष्ट्रीय संस्कृति के माध्यम के रूप में हिंदी का प्रचार करने का कार्य सौंपता है।

इन संवैधानिक प्रावधानों के विस्तृत विवरण के लिए, छात्र 'अथर्व एग्जामवाइज़ स्टडी मटेरियल' और 'पॉलिटी नोट्स' का संदर्भ ले सकते हैं।

न्यायशास्त्रीय स्पष्टता: "राजभाषा" बनाम "राष्ट्रभाषा"

प्रतियोगी परीक्षाओं में एक लगातार बनी रहने वाली गलत धारणा यह है कि हिंदी भारत की वैधानिक राष्ट्रभाषा है। संविधान किसी एक राष्ट्रभाषा को मान्यता नहीं देता है। यह सख्ती से हिंदी और अंग्रेजी को संघ की राजभाषाओं के रूप में मान्यता देता है।

सुरेश कछाड़िया बनाम भारत संघ (2010) में, गुजरात उच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत की पुष्टि करते हुए फैसला सुनाया कि संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में वर्गीकृत नहीं करता है, और आठवीं अनुसूची के तहत सूचीबद्ध क्षेत्रीय भाषाएं समान दर्जा बनाए रखती हैं।

अनुच्छेद 351 एक बलपूर्वक जनादेश के बजाय एक प्रोत्साहक निर्देश के रूप में कार्य करता है। यह संघ को हिंदुस्तानी और आठवीं अनुसूची की भाषाओं से रूपों, शैलियों और अभिव्यक्तियों को आत्मसात करके हिंदी को समृद्ध करने का कार्य सौंपता है, जबकि शब्दावली के लिए मुख्य रूप से संस्कृत से और द्वितीयक रूप से अन्य स्वदेशी भाषाओं (बोलियों) से शब्द ग्रहण करता है। इस दोहरे जनादेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासनिक विकास क्षेत्रीय भाषाई विरासतों से समझौता न करे।

वैधानिक विकास: राजभाषा अधिनियम और प्रशासनिक नियम

जैसे ही 15 साल की संवैधानिक संक्रमणकालीन समयरेखा समाप्ति के करीब आई, संसद ने राजभाषा अधिनियम, 1963 को अधिनियमित करने के लिए अनुच्छेद 343(3) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया। प्रायद्वीपीय भारत में व्यापक क्षेत्रीय लामबंदी—विशेष रूप से 1965 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन—ने राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 को जन्म दिया, जिसने एक स्थायी वैधानिक समझौते को औपचारिक रूप दिया:

धारा 3(1): अधिनियम की इस धारा ने संघ के सभी आधिकारिक लेन-देन और संसदीय कार्यों के लिए हिंदी के साथ अंग्रेजी के अनिश्चित काल तक जारी रहने को संस्थागत कर दिया।

धारा 3(3): महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपकरणों में अनिवार्य द्विभाषी दस्तावेज़ीकरण (हिंदी और अंग्रेजी दोनों) को अनिवार्य कर दिया: संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, प्रशासनिक अधिसूचनाएं, निविदाएं, प्रशासनिक रिपोर्ट और सरकारी अनुबंध।

धारा 3(5): एक संघीय सुरक्षा उपाय पेश किया, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि अंग्रेजी को एक सहयोगी राजभाषा के रूप में तब तक बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि हर गैर-हिंदी भाषी राज्य विधानमंडल इसे समाप्त करने की वकालत करते हुए एक औपचारिक प्रस्ताव पारित न करे और संसद के दोनों सदन सहमत न हों।

प्रशासनिक सीमांकन: राजभाषा नियम, 1976

राजभाषा अधिनियम के तहत प्रख्यापित, राजभाषा (संघ के आधिकारिक प्रयोजनों के लिए उपयोग) नियम, 1976 ने पूरे भारत में केंद्रीय प्रशासनिक संचार को विनियमित करने के लिए त्रि-स्तरीय भौगोलिक वर्गीकरण बनाया:

क्षेत्रीय श्रेणीअधिकार क्षेत्र का दायराआधिकारिक अंतर-सरकारी विमर्श के लिए नियामक जनादेश
क्षेत्र 'क' [cite: 14]उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली।

- केंद्रीय मंत्रालयों से इन राज्यों को किया जाने वाला संचार विशेष रूप से हिंदी में होना चाहिए।


 

- अंग्रेजी में भेजे गए किसी भी दुर्लभ पत्राचार में अधिकृत हिंदी अनुवाद शामिल होना चाहिए।


 

- यहां स्थित केंद्रीय कार्यालयों के भीतर आंतरिक मसौदा तैयार करना (ड्राफ्टिंग) और फ़ाइल नोटिंग हिंदी में होनी चाहिए।

क्षेत्र 'ख' [cite: 14]महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़, दमन और दीव, और दादरा और नगर हवेली।

- केंद्रीय विभागों से इन राज्यों को किया जाने वाला संचार आम तौर पर हिंदी में तैयार किया जाता है।


 

- यदि संचार अंग्रेजी में प्रेषित किया जाता है, तो साथ में हिंदी अनुवाद मानक प्रथा है।


 

- सार्वजनिक संचार और प्रशासनिक अधिसूचनाएं द्विभाषी प्रारूप का पालन करती हैं।

क्षेत्र 'ग' [cite: 14]शेष सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों सहित)।

- केंद्रीय अधिकारियों और इन राज्यों के बीच संचार अंग्रेजी में आयोजित किया जाता है।


 

- हिंदी में आने वाले पत्राचार को हिंदी में पावती मिल सकती है, लेकिन अंग्रेजी मानक कामकाजी प्रशासनिक भाषा बनी रहती है।


 

- वैधानिक छूट: ये नियम तमिलनाडु राज्य पर लागू नहीं होते हैं।

संस्थागत ढांचा, राष्ट्रीय पुरस्कार और तकनीकी पहल

गृह मंत्रालय के अंतर्गत जून 1975 में स्थापित राजभाषा विभाग, संघ कार्यकारिणी में भाषा के कार्यान्वयन की देखरेख करने वाली नोडल प्रशासनिक एजेंसी के रूप में कार्य करता है। आधिकारिक अनुपालन मानकों और संकल्पों को गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के माध्यम से ट्रैक किया जा सकता है। संसदीय निगरानी राजभाषा पर संसदीय समिति के माध्यम से बनाए रखी जाती है, जिसकी स्थापना 1963 अधिनियम की धारा 4 के तहत की गई थी। आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से चुने गए 20 लोकसभा और 10 राज्यसभा सदस्यों से मिलकर बनी यह समिति नियमित रूप से भाषा कार्यान्वयन पर अपनी मूल्यांकनात्मक सिफारिशें सीधे भारत के राष्ट्रपति को सौंपती है।

हिंदी दिवस पर प्रदान किए जाने वाले प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कार

वार्षिक अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान, संघ कार्यकारिणी दो प्राथमिक सम्मान प्रस्तुत करती है:

राजभाषा कीर्ति पुरस्कार: केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और राष्ट्रीयकृत वित्तीय संस्थानों को प्रदान किया जाता है जो वार्षिक प्रशासनिक कार्यक्रम के तहत राजभाषा लक्ष्यों के उत्कृष्ट अनुपालन का प्रदर्शन करते हैं।

राजभाषा गौरव पुरस्कार: उन व्यक्तिगत नागरिकों, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मियों और डोमेन विशेषज्ञों को प्रदान किया जाता है जो विज्ञान, समकालीन प्रौद्योगिकी, कानून, प्रशासनिक सिद्धांत और सामान्य विज्ञान में फैले हिंदी में मूल, सहकर्मी-समीक्षित किताबें लिखते हैं।

राजभाषा शासन में तकनीकी आधुनिकीकरण

संघ प्रशासन ने अनुवाद की बाधाओं को कम करने और क्षेत्रीय भाषाओं को जोड़ने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण को एकीकृत किया है:

कंठस्थ 2.0: राजभाषा विभाग द्वारा विकसित, यह अनुवाद स्मृति मंच पहले अनुवादित प्रशासनिक शब्दावली को संग्रहीत करने, कानूनी वाक्यांशों को मानकीकृत करने और केंद्रीय सचिवालयों में दोहरे प्रशासनिक श्रम को कम करने के लिए न्यूरल मशीन ट्रांसलेशन का उपयोग करता है।

डिजिटल इंडिया भाषिणी प्लेटफॉर्म: राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के नेतृत्व में, भाषिणी आठवीं अनुसूची की सभी 22 भाषाओं में ओपन-सोर्स प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण डेटासेट और वॉयस-ट्रांसलेशन टूल का निर्माण करता है, जिससे डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं तक नागरिकों की पहुंच का विस्तार होता है।

सारथी अनुवाद वास्तुकला और हिंदी शब्द सिंधु कोष: गृह मंत्रालय द्वारा पेश किया गया, सारथी मंच सरकारी विभागों में सहायक अंतर-भाषा अनुवाद उपकरण प्रदान करता है, जबकि हिंदी शब्द सिंधु कोष पहल उभरती तकनीकी, पुलिसिंग, न्यायिक और वैज्ञानिक शब्दावली को शामिल करते हुए एक विस्तृत डिजिटल शब्दकोश का निर्माण कर रही है।

शासन, प्रौद्योगिकी और संवैधानिक प्रशासन को जोड़ने वाली मूलभूत अवधारणाओं को 'अथर्व एग्जामवाइज़ एनसीईआरटी फाउंडेशन कोर्स' में व्यवस्थित रूप से कवर किया गया है।

महत्वपूर्ण नीतिगत बहस: भाषाई संघवाद और प्रशासनिक सुधार

भारत में भाषा नीति का विकास एक विविध संघीय लोकतंत्र की मांगों के साथ प्रशासनिक दक्षता को सुसंगत करने के चल रहे प्रयास पर प्रकाश डालता है।

भाषाई संघवाद बनाम प्रशासनिक एकीकरण

भारतीय भाषाई शासन के भीतर तनाव राष्ट्रीय एकजुटता को भाषाई विविधता के साथ संतुलित करने पर केंद्रित है:

व्यापक हिंदी अपनाने के पैरोकार इस बात पर जोर देते हैं कि यह 43.6% से अधिक आबादी (2011 की जनगणना) की प्राथमिक भाषा है, यह तर्क देते हुए कि यह अंग्रेजी पर औपनिवेशिक निर्भरता को बदलने के लिए एक स्वदेशी प्रशासनिक सेतु के रूप में कार्य करती है।

गैर-हिंदी भाषी राज्यों का तर्क है कि विषम भाषाई जनादेश राजनीतिक अलगाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता का जोखिम पैदा करते हैं, विशेष रूप से संघीय भर्ती और सिविल सेवा पहुंच के संबंध में। श्रीलंका के 1956 के 'सिन्हाला ओनली एक्ट' (केवल सिंहली अधिनियम) जैसे कठोर एकल-भाषावाद को अपनाने वाले राज्यों के विपरीत—भारत की संघीय स्थिरता संस्थागत लचीलेपन, असममित नियमों और निरंतर द्विभाषावाद पर निर्भर रही है।

NEP 2020 के तहत त्रि-भाषा सूत्र

पहली बार कोठारी आयोग (1964-66) द्वारा तैयार किया गया और 1968 और 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में दोहराया गया, त्रि-भाषा सूत्र का उद्देश्य राष्ट्रीय भाषाई पारस्परिकता का निर्माण करना है:

हिंदी भाषी राज्यों में, छात्र हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (अधिमानतः एक दक्षिण भारतीय भाषा) का अध्ययन करते हैं।

गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, छात्र क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी और हिंदी का अध्ययन करते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने यह निर्दिष्ट करते हुए इस ढांचे की फिर से पुष्टि की कि तीन में से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल निवासी होनी चाहिए। हालाँकि, संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। कई उत्तरी राज्य समकालीन दक्षिणी भाषाओं के बजाय शास्त्रीय संस्कृत का उपयोग करके तीसरी भाषा के जनादेश को पूरा करते हैं, जिससे अंतर-क्षेत्रीय एकीकरण सीमित हो जाता है। इस बीच, तमिलनाडु जैसे राज्य द्वि-भाषा सूत्र (तमिल और अंग्रेजी) का पालन करना जारी रखते हैं, यह मानते हुए कि केंद्रीय भाषा रूपरेखा क्षेत्रीय भाषाई स्वायत्तता के विपरीत है।

उच्च न्यायपालिका की भाषा (अनुच्छेद 348)

न्याय प्रशासन एक और चल रही नीतिगत बहस पर प्रकाश डालता है:

अनुच्छेद 348(2) के तहत, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में उच्च न्यायालय की कार्यवाही के लिए हिंदी के उपयोग को मंजूरी दी गई है।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार अपनी सुनवाई में हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं की अनुमति देने की याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि एक एकीकृत राष्ट्रीय न्यायशास्त्र, कानूनी निश्चितता और न्यायाधीशों की राष्ट्रव्यापी गतिशीलता की आवश्यकता है।

संवैधानिक आवश्यकताओं को बदले बिना पहुंच में सुधार करने के लिए, न्यायपालिका ने व्यापक जनता के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में प्रामाणिक निर्णयों का अनुवाद करने के लिए SUVAS (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) जैसे उपकरण तैनात किए हैं।

मुख्य तथ्य और परीक्षा-प्रासंगिक डेटा

निम्नलिखित संरचित तथ्य प्रारंभिक और राज्य सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए उच्च-उपज संदर्भ सामग्री प्रदान करते हैं:

आठवीं अनुसूची का विस्तार: आठवीं अनुसूची ने शुरू में 1950 में 14 भाषाओं को मान्यता दी थी। बाद के संवैधानिक संशोधनों ने इसका विस्तार 22 तक कर दिया:

21वां संशोधन अधिनियम, 1967: सिंधी को शामिल किया।

71वां संशोधन अधिनियम, 1992: कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को शामिल किया।

92वां संशोधन अधिनियम, 2003: बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया।

प्रथम राजभाषा आयोग: अनुच्छेद 344(1) के अनुसरण में 1955 में बी. जी. खेर की अध्यक्षता में गठित, जिसने 1956 में राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

राज्यों का भाषाई पुनर्गठन: फजल अली आयोग के निष्कर्षों के बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के माध्यम से शुरू किया गया, जिसने राज्य की आंतरिक सीमाओं के लिए भाषा को प्राथमिक मानदंड के रूप में पुष्टि की।

शास्त्रीय भाषा मानदंड: आठवीं अनुसूची से अलग, संस्कृति मंत्रालय द्वारा ऐतिहासिक प्राचीनता (1,500-2,000 वर्षों में फैली दर्ज विरासत), एक मूल साहित्यिक वांग्मय और विशिष्ट ग्रंथों के आधार पर शास्त्रीय दर्जा प्रदान किया जाता है। छह भाषाओं को यह दर्जा प्राप्त है: तमिल (2004), संस्कृत (2005), तेलुगु (2008), कन्नड़ (2008), मलयालम (2013), और ओडिया (2014)।

यह आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए क्यों मायने रखता है

भाषाई शासन और हिंदी दिवस से जुड़े संवैधानिक मुद्दे प्रतियोगी परीक्षाओं के कई चरणों में प्रासंगिक हैं:

यूपीएससी प्रीलिम्स (सामान्य अध्ययन पेपर I): भाग XVII के प्रावधानों, अनुच्छेद 343, 344, 348 और 351 की कार्यप्रणाली, राजभाषा पर संसदीय समिति की संरचना, आठवीं अनुसूची में संशोधन और राजभाषा अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों पर प्रत्यक्ष मूल्यांकन।

यूपीएससी मेन्स (सामान्य अध्ययन पेपर II - राजव्यवस्था और शासन): भाषाई संघवाद, अनुच्छेद 346 के तहत अंतर-राज्य प्रशासनिक तंत्र, अनुच्छेद 348 के तहत न्यायिक सुधार, और एनईपी 2020 के तहत त्रि-भाषा सूत्र के संबंध में केंद्र-राज्य घर्षण से संबंधित विश्लेषणात्मक प्रश्न।

यूपीएससी मेन्स (सामान्य अध्ययन पेपर I - भारतीय समाज): भाषाई विविधता, क्षेत्रवाद, अनुच्छेद 350A और 350B के तहत भाषाई अल्पसंख्यक अधिकारों के संरक्षण, और बहुलवाद के समायोजन को संबोधित करने वाले समाजशास्त्रीय आकलन।

यूपीएससी निबंध पेपर: संघीय एकजुटता, सांस्कृतिक बहुलवाद, समावेशी शासन के एक वाहन के रूप में भाषा, और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण पर विषयगत प्रश्न।

राज्य पीसीएस परीक्षाएं (एमपीपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी, आरपीएससी): राजभाषा नियम 1976 (क्षेत्र 'क', 'ख' और 'ग' वर्गीकरण) के साथ-साथ अनिवार्य सामान्य हिंदी और मसौदा (ड्राफ्टिंग) प्रश्नपत्रों के तहत प्रशासनिक नियमों को अधिक महत्व दिया गया है।

सिविल सेवा व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू): राष्ट्रीय एकीकरण, भाषाई स्वायत्तता, और भाषिणी और कंठस्थ जैसी डिजिटल अनुवाद प्रौद्योगिकियों की तैनाती पर उम्मीदवार के संतुलित दृष्टिकोण का मूल्यांकन करने वाले गहन साक्षात्कार।

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